ऐसा पशु प्रेमी नहीं देखा होगा आपने, पढ़िए भगत की पूरी कहानी !
मजबूत हौंसले से सेवा भाव के चलते लोगों के बीच भगत नाम से जाना जाता है! यह व्यक्ति
घायल पशुओं के इलाज से लेकर मृत पशुओं के संस्कार करने वाले इस व्यक्ति को लोग उसके असली नाम से नहीं जानते हैं। मसला ही कुछ ऐसा है कि उसे लोग भगत नाम से बुलाने लगे। और अब यहीं नाम सब जानते हैं। उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के मीरानपुर कटरा में रहने वाले भगत ने इस बारे में खुद बताया कि वैसे उनका नाम रमेश जायसवाल है। लेकिन अब लोग उन्हे भगत नाम से पुकारने लगे और यह नया नाम प्रचलन में आ गया है।
सरला देवी जो कि भगत की पत्नी हैं वह कहती हैं कि वह घूमते हुए पशुओं का इलाज करते हैं। सरला देवी आगे बताती हैं कि अगर कोई आकर बता दे कि फलां जगह कोई जानवर घायल है तो वह तुरंत ही घर बिना बताए ही निकल जाते हैं। वह पशुओं के इलाज में असावधान भी रहते हैं और कई बार कीडे पड़े घावों को हाँथ से साफ करते हैं जिसे लेकर हम घर के लोग इन पर नाराज भी हो जाते हैं।
वह घर से निकल कर गोशाला निकल जाते हैं और वहाँ गायों के साथ रहते हैं उनकी सेवा में लग जाते हैं। घर में परचून की एक दुकान है वह उसके पैसे निकाल ले जाते हैं और उसे पशुओं पर खर्च कर देते हैं। कई कई दिन
गौ-शाला में गायों के पास रहते हैं। आशीष जायसवाल इनके काम के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि उन्होने कई मृत पशुओं की समाधि भी बनाई है जिनमें कुछ पक्की भी हैं।
वह घायल पशुओं का निस्वार्थ इलाज करते हैं बंदर गाय या फिर और कोई पशु हो जितना भी संभव होता है, वह पशुओं के लिए करते हैं। अगर कोई पशु इलाज के बाद भी नहीं बचता है तो वह उसकी अंतिम यात्रा निकाल कर उसका अंतिम संस्कार विधिवत ढंग से कर देते हैं। भगत जी के बारे में एक और घटना का उल्लेख करते हुए आशीष बताते हैं कि नहरिया से गौ -शाला की तरफ जाने वाले सड़क पर ईदगाह भी है। यहाँ पर पहले लोग खुले में शौच करते थे। भगत ने आसपास के लोगों को कई बार समझाया कि यह उचित नहीं है लेकिन लोग नहीं माने और इसके बाद भगत खुरपी लेकर दिन में वहाँ शौच से फैली गंदगी हर रोज साफ करने लगे।
इसके बाद लोगों को अपना रवैया बदलना ही पड़ा और उन लोगों ने खुले में शौच करना बंद कर दिया। यहाँ के लोगों में भगत के कार्य के बारे हर कोई जानता है। कुछ लोगों ने भगत के द्वारा बनवाई गई कुछ पक्की समाधि भी दिखाईं। दरअसल यह समाधि करीब 30 से लेकर 20 साल पहले की हैं। इसमें गाय और एक बंदर की समाधि है। यह भगत ने उन पशुओं की याद में बनवाई थी। भगत के पड़ोस में रहने वाली किरण बताती हैं कि यह पशुओं की सेवा करते हैं। उन्हे नहलाते हैं। चारा पानी की व्यवस्था करते हैं। इतना ही नहीं किरण के अनुसार अगर किसी पशु की मृत्यु होती है तो वह उसका अंतिम संस्कार भी करते हैं। हालाँकि इस काम में और लोग भी साथ आ जाते हैं लेकिन आगे भगत ही चलते हैं। वहीं मीरानपुर कटरा की गौशाला में कार्यरत एक कर्मचारी जय सिंह ने बताया कि भगत यहाँ आ जाते हैं गायों की अपने हाँथों से सेवा करते हैं उन्हे पानी पिलाते हैं, हरियाली (हरा चारा) डालते हैं, घायल पशुओं की देखभाल करते हैं। भगत के नाम के बारे में यहाँ के और लोग भी बताते हैं कि वह व्यक्ति शुरुआत से ही बहुत धार्मिक है। इसलिए इनका नाम भगत पड़ गया है। भगत के घर के लोग बताते हैं कि घर की दुकान से भगत पैसे निकाल कर चले जाते हैं और दुकान के पैसे सेवा भाव में लगा देते हैं। घर के पास में ही एक बार कुछ पिल्ले दुर्घटना में मर गए जिसके बाद भगत ने इसकी शिकायत की और अब घर के पास निकली सड़क पर गति अवरोधक बना दिए गए हैं ताकि भविष्य की संभावित दुर्घटना को टाला जा सके। रमेश जायसवाल के घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है लेकिन उनका हौंसला उन्हे हर रोज सड़कों पर भेजता है ताकि वह असहाय पशुओं की मदद कर सकें।
किसान समूह डेस्क
शाहजहाँपुर
घायल पशुओं के इलाज से लेकर मृत पशुओं के संस्कार करने वाले इस व्यक्ति को लोग उसके असली नाम से नहीं जानते हैं। मसला ही कुछ ऐसा है कि उसे लोग भगत नाम से बुलाने लगे। और अब यहीं नाम सब जानते हैं। उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के मीरानपुर कटरा में रहने वाले भगत ने इस बारे में खुद बताया कि वैसे उनका नाम रमेश जायसवाल है। लेकिन अब लोग उन्हे भगत नाम से पुकारने लगे और यह नया नाम प्रचलन में आ गया है।
सरला देवी जो कि भगत की पत्नी हैं वह कहती हैं कि वह घूमते हुए पशुओं का इलाज करते हैं। सरला देवी आगे बताती हैं कि अगर कोई आकर बता दे कि फलां जगह कोई जानवर घायल है तो वह तुरंत ही घर बिना बताए ही निकल जाते हैं। वह पशुओं के इलाज में असावधान भी रहते हैं और कई बार कीडे पड़े घावों को हाँथ से साफ करते हैं जिसे लेकर हम घर के लोग इन पर नाराज भी हो जाते हैं।
वह घर से निकल कर गोशाला निकल जाते हैं और वहाँ गायों के साथ रहते हैं उनकी सेवा में लग जाते हैं। घर में परचून की एक दुकान है वह उसके पैसे निकाल ले जाते हैं और उसे पशुओं पर खर्च कर देते हैं। कई कई दिन
गौ-शाला में गायों के पास रहते हैं। आशीष जायसवाल इनके काम के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि उन्होने कई मृत पशुओं की समाधि भी बनाई है जिनमें कुछ पक्की भी हैं।
वह घायल पशुओं का निस्वार्थ इलाज करते हैं बंदर गाय या फिर और कोई पशु हो जितना भी संभव होता है, वह पशुओं के लिए करते हैं। अगर कोई पशु इलाज के बाद भी नहीं बचता है तो वह उसकी अंतिम यात्रा निकाल कर उसका अंतिम संस्कार विधिवत ढंग से कर देते हैं। भगत जी के बारे में एक और घटना का उल्लेख करते हुए आशीष बताते हैं कि नहरिया से गौ -शाला की तरफ जाने वाले सड़क पर ईदगाह भी है। यहाँ पर पहले लोग खुले में शौच करते थे। भगत ने आसपास के लोगों को कई बार समझाया कि यह उचित नहीं है लेकिन लोग नहीं माने और इसके बाद भगत खुरपी लेकर दिन में वहाँ शौच से फैली गंदगी हर रोज साफ करने लगे।
इसके बाद लोगों को अपना रवैया बदलना ही पड़ा और उन लोगों ने खुले में शौच करना बंद कर दिया। यहाँ के लोगों में भगत के कार्य के बारे हर कोई जानता है। कुछ लोगों ने भगत के द्वारा बनवाई गई कुछ पक्की समाधि भी दिखाईं। दरअसल यह समाधि करीब 30 से लेकर 20 साल पहले की हैं। इसमें गाय और एक बंदर की समाधि है। यह भगत ने उन पशुओं की याद में बनवाई थी। भगत के पड़ोस में रहने वाली किरण बताती हैं कि यह पशुओं की सेवा करते हैं। उन्हे नहलाते हैं। चारा पानी की व्यवस्था करते हैं। इतना ही नहीं किरण के अनुसार अगर किसी पशु की मृत्यु होती है तो वह उसका अंतिम संस्कार भी करते हैं। हालाँकि इस काम में और लोग भी साथ आ जाते हैं लेकिन आगे भगत ही चलते हैं। वहीं मीरानपुर कटरा की गौशाला में कार्यरत एक कर्मचारी जय सिंह ने बताया कि भगत यहाँ आ जाते हैं गायों की अपने हाँथों से सेवा करते हैं उन्हे पानी पिलाते हैं, हरियाली (हरा चारा) डालते हैं, घायल पशुओं की देखभाल करते हैं। भगत के नाम के बारे में यहाँ के और लोग भी बताते हैं कि वह व्यक्ति शुरुआत से ही बहुत धार्मिक है। इसलिए इनका नाम भगत पड़ गया है। भगत के घर के लोग बताते हैं कि घर की दुकान से भगत पैसे निकाल कर चले जाते हैं और दुकान के पैसे सेवा भाव में लगा देते हैं। घर के पास में ही एक बार कुछ पिल्ले दुर्घटना में मर गए जिसके बाद भगत ने इसकी शिकायत की और अब घर के पास निकली सड़क पर गति अवरोधक बना दिए गए हैं ताकि भविष्य की संभावित दुर्घटना को टाला जा सके। रमेश जायसवाल के घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है लेकिन उनका हौंसला उन्हे हर रोज सड़कों पर भेजता है ताकि वह असहाय पशुओं की मदद कर सकें।
किसान समूह डेस्क
शाहजहाँपुर



Comments
Post a Comment