किसानो का अवैध खनन को लेकर जल सत्यग्रह


महिला किसानो का जल सत्याग्रह, क्यों कर रही है विरोध !

उत्तरप्रदेश के जनपद खपटिहा कला खदान में अवैध खनन और किसानों की भूमि से जबरन निकाली जा रही बालू तथा ठेकेदारों और माफिया सिंडिकेट की दबंगई के विरोध में महिला पुरुष किसानों ने सोमवार को खदान के पास नदी में जल सत्याग्रह किया। पानी में घंटो तक बैठे रहे माफियाओं और प्रशासन के विरुद्ध जमकर  नारेबाजी की । आरोप लगाया कि बालू माफिया किसानों को धमकी दे रहे हैं सोमवार को दर्जनों महिलाओं पुरुषों ने नदी की जलधारा में बैठकर जल सत्याग्रह किया।

जल सत्यग्रह करते किसान 

कुछ ही देर बाद पुलिस की मौजूदगी भी  आंदोलन चला। दोपहर को एसडीएम राम कुमार और पुलिस क्षेत्र अधिकारी मौके पर पहुंचे और किसानों से बातचीत की प्रशाशन की नोकझोंक भी हुई किसानों ने आरोप लगाया कि बालू खदानों के गुर्गे महिला किसानों से अश्लीलता कर रहे हैं। आंदोलन कर रही ऊषा निषाद आदि ने एसडीएम को इस बाबत ज्ञापन भी सौंपा। इस पर एसडीएम ने पैलानी क्षेत्राधिकारी और तहसीलदार तथा जिला खनिज अधिकारी को पत्र जारी कर पूछा ऊषा निषाद और अन्य किसानों की शिकायत का हवाला देकर खपटिहा कला में रुसी ट्रेडर्स साई चरण इंफ्राटेक ग्राम सभा की भूमि पर अवैध खनन किए  जाने शिकायत की हैं। एसडीएम ने शिकायती पत्र का को उक्त अधिकारियों को सौंपते हुए कहा कि इसमें लिखित बिंदुओं पर जांच कराकर तत्काल निस्तारण कराएं और कार्यवाही से अवगत कराएं।


इस पूरे मामले पर सुमन कहती हैं, ''खनन कंपनी को ज‍िस जगह का पट्टा मिला है वहां अब बालू नहीं बचा, ऐसे में यह कंपनियां हमारी जमीनों को खोदकर बालू निकाल रही हैं। इसके ल‍िए हमसे सहमति भी नहीं ली गई और विरोध करने पर जान से मारने व फर्जी मुकदमे में फंसाने की धमकी भी देते हैं।''

गांव वालों की ओर से जो श‍िकायत की गई है उसके मुताबिक, आरुष‍ि ट्रेडर्स और साई चरण ट्रेडर्स नाम की दो खनन कंपनियां मिलकर ग्राम सभा की जमी पर अवैध खनन कर रही हैं। इन कंपनियों की ओर से ग्रामसभा की भूमि गाटा संख्‍या- 100/3, 273, 269, 299, 297, 296 में अवैध खनन किया गया है।

पर्यावरण को भी नुकसान

वहीं, इस पूरे मामले का एक पहलू यह भी है कि बालू खनन से पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। बांदा जिले के ही रहने वाले सामाजसेवी आशीष सागर बताते हैं, ''केन नदी में अवैध खनन हमेशा से होता आया है। खनन कंपनियां जो मौरंग न‍िकाल रही हैं वो आज का नहीं है, यह मौरंग 1992 में आई बाढ़ से यहां आया था, बाद में इसपर खेत बन गए और मौरंग नीचे दब गया। खनन माफिया इसी मौरंग को हासिल करने के लिए मशीनों से बड़े-बड़े गड्ढे खुदवाते हैं, जबकि नियम है कि मशीनों से खनन नहीं हो सकता।'

किसान समूह डेस्क 
साकेत अवस्थी 
बाँदा 

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